हार नहीं मानूंगा

रिपोर्ट: साभारः

लक्ष्य के प्रति समर्पित दृढ़निश्चयी लोग बार-बार की हार और दूसरों के व्यंग्य बाणों से हताश हुए बिना पूरी ईमानदारी व आत्मविश्वास के साथ अपने कर्म में लगे रहते हैं। यही कारण है कि जब वे अप्रत्याशित कामयाबी पाते हैं, तो इस परिणाम से हर कोई हैरान हो जाता है। जीतने और आगे बढ़ने में कैसे सफल होते हैं ऐसे लोग? आप भी कैसे हासिल कर सकते हैं अपने सपनों की मंजिल? बता रहे हैं अरुण श्रीवास्तव... आखिरकार उन्होंने दिल्ली जीत ही लिया। आज उनकी जय-जयकार करने में कोई पीछे नहीं है। हालांकि पहले कोई भी उनकी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं था। विरोधी दलों से लेकर मीडिया तक उनकी आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था, पर जब परिणाम आया तो हर कोई दंग रह गया। जिसे अपने जीतने का गुमान था, वह भी जनता की सुनामी की आगे कहीं टिक नहीं पाया। हालांकि यह सब इतना आसान भी नहीं था। यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें और उनकी पूरी टीम को हार और अपमान के कड़वे घूंट पीने पड़े थे। पर इससे न तो उनका सब्र टूटा और न ही चेहरे की मुस्कुराहट गई। पिछली गलतियों से सबक लेते हुए उन्होंने कामयाबी की नई और ठोस इबारत लिख दी। जीत की बुनियाद बहुत दिन नहीं हुए। उन्होंने और उनकी टीम ने अपने आंदोलन को जनांदोलन में तब्दील कर दिया था। पूरा देश उनकी ओर देख रहा था। उत्साह में उन्होंने राजनीति में दस्तक दी और पहले ही प्रयास में सत्तासीन दल को धूल चटा दी। हालांकि खुद दूर रह जाने के बावजूद पूर्व सत्तारूढ़ दल के सहयोग से सरकार तो बना लिया, लेकिन अवरोधों के आगे करीब डेढ़ महीने में ही अपने कदम पीछे खींच लिए। देश के लोगों को यह पसंद नहीं आया, पर अति-उत्साह में उनकी टीम ने लोकसभा चुनाव में अपने सारे पत्ते खोल दिए। पर जब परिणाम आया, तो उनका अति-उत्साह बिखर गया। गलतियों से सबक वे सभी आत्ममंथन के लिए मजबूर हो गए। उन्हें लगा कि कहीं न कहीं तो उनसे चूक हुई है। उन्होंने इसे सच्चे मन से स्वीकार किया। हारने के बावजूद उनके मन ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने आत्मबल को फिर संजोया और फिर पूरी ताकत से कदम आगे बढ़ाने का निर्णय किया। उन्होंने ठोस रणनीति बनाई। घर-घर जाकर पिछली गलती की माफी मांगते हुए आगे एक मौका और देने का अनुरोध किया। उधर, लंबे समय से दिखाये जा रहे सपनों से ऊब रही जनता को उनसे उम्मीद दिखने लगी। आखिरकार जनता ने एकजुटता दिखाते हुए उन्हें ऐसी जीत दिला दी, जिसकी कल्पना खुद उन्होंने भी नहीं की थी। संयम का फल दरअसल, यह अप्रत्याशित परिणाम खुद उनके और उनकी टीम के संयम का प्रतिफल ही है। सत्ता मिलने के बाद उसे छोड़ने और संसदीय चुनाव में मिली तगड़ी हार के बावजूद वे न तो हताश हुए और न ही अपना संयम खोया। शीघ्र ही उन्होंने अपने आत्मबल को संजोया और खुद को सिर्फ दिल्ली पर ही केंद्रित करने का फैसला किया। हालांकि इस दौरान उन्हें और उनकी टीम को अपमान और व्यंग्य-बाण भी झेलने पड़े। उन्हें भगोड़ा और जमानत जब्त जैसे संबोधन दिए जाने लगे थे। राह चलना मुश्किल हो गया था। उनके कुछ सक्रिय साथी तक साथ छोड़ते जा रहे थे। फिर भी वे विचलित नहीं हुए। उन्हें जनता और उसकी ताकत पर भरोसा था। इसीलिए वे जनता के बीच गए और सीधे उन्हें ही स्पष्टीकरण देते हुए पिछली गलतियों के लिए माफी मांगी। जनता को उनकी ईमानदारी पर भरोसा तो था ही, उसने उन्हें मौका देना और दूसरों को सबक सिखाना जरूरी समझा। हार में छिपी जीत दिल्ली के राजनीतिक संग्राम को देश के साथ-साथ पूरी दुनिया ने देखा और महसूस किया है। इससे एक बार फिर यह साबित हुआ कि कोई भी बड़ी जीत एक बार में ही नहीं मिल जाती। इसके पीछे लंबा संघर्ष और हार का सिलसिला भी हो सकता है। हां, आगे वही निकलता है, जो हार से हताश हुए बिना इससे सबक लेता है। इसके पीछे के कारणों-कमजोरियों का विश्लेषण करते हुए पूरे मन से उन्हें दूर करने में जुट जाता है। सबक तरक्की के हार के दंश को भूलते हुए आत्मविश्वास और नई उमंग के साथ वह आगे कदम बढ़ाता है। उसे रुकना नहीं भाता। कोई भी अवरोध उसका रास्ता नहीं रोक नहीं पाता, क्योंकि उसके भीतर अवरोधों को पार करने का जज्बा होता है। दिल्ली की जीत हर उस इंसान के लिए सबक है, जो आगे बढ़ना चाहता है। निराशा, हताशा, अवसाद, नकारात्मकता जैसे शब्द जिसके शब्दकोश में हैं ही नहीं, वह अंधेरे में भी उजाले की किरण ढूंढ़ लेता है और उस किरण के सहारे उजाले का आकाश बना देता है। * एक या कुछ बार की हार या असफलता का मतलब यह नहीं कि आप कभी जीतेंगे नहीं। * अपनी पराजय से सबक लेते हुए जो हार के कारणों, कमजोरियों को समय रहते दूर कर लेता है, वह एक न एक दिन जरूर कामयाब होता है। * आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने वाले राह में आने वाली बाधाओं से नहीं घबराते, बल्कि उनसे पार पाने का जतन करते हैं।


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