व्यक्तिगत इच्छा को ब्रह्म इच्छा के साथ विलीन करना सिखाता है 'क्रिया योग' : परमहंस प्रज्ञानानंद

रिपोर्ट: रमेश पाण्डेय

क्रिया योग जो महावतार बाबाजी महाराज लाहिड़ी महाशय श्री युक्तेश्वर जी परमहंस योगानंद जी और परमहंस हरिहरानंद जी द्वारा शुरू किया गया था। अब उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी परमहंस प्रज्ञानंद जी विश्व के अनेक देशों के साथ ही भारत के विभिन्न भागों में क्रिया योग के प्रसारार्थ सघन भ्रमण कर रहे हैं। भारत के प्राचीन कालीन ऋषियों ने अष्टांग योग का अभ्यास किया एवं 8 स्तरों में अधिकार प्राप्त कर स्वयं को माया मोह एवं भ्रांति से मुक्त कर सत्य को अनुभूत किया। योग के सर्वोपरि व्याख्या कार महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित राजयोग को अष्टांग योग अर्थात 8 अंगों वाला योग भी कहते हैं। अष्टांग योग सिद्धांत ऐसा है जिसे यम नियम की चट्टानी नीव पर अपनी आध्यात्मिक उपलब्धि को आधार देकर केवल योगी ही अनुसरण कर सकते हैं।

क्रिया योग पतंजलि के योग सूत्र में दिए गए स्वरूप का विकसित रूप है। योगिक प्रविधियां के सार को पुनर्जीवित कर क्रिया योग के नाम से सभी देशों में प्रसारित किया गया। क्रिया योग सभी योग पद्धतियों का सार है यद्यपि उनमें से किसी के समान भी नहीं। प्राचीन ऋषियों की विधि अत्यधिक कठिन थी यद्यपि वे ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कराते थे| उन्होंने ही योग को अति विशिष्ट बनाया था। वे पारिवारिक संबंधों को त्याग कर एकांतवास में ईश्वर अनुभूति प्राप्त करने का प्रयास करते थे। इस प्रकार आध्यात्मिक अभ्यास द्वारा गृहस्थ स्वयमेव अलग हो जाते थे। इस तरह के अनुशासन से भिन्न क्रिया योग का अभ्यास सरल है एवं यह किसी तरह की कोई असुविधा उत्पन्न नहीं करता। इसका अभ्यास किसी भी आयु एवं अन्य किसी भी पद के अनुयायी निर्भय होकर कर सकते हैं।

क्रिया योग का विज्ञान व्यक्तिगत इच्छा को ब्रह्म इच्छा के साथ विलीन करना मन एवं रूपांतरण को नियंत्रित करना सिखाता है इस तरह मुक्ति प्राप्त कराता है। भौतिक धरातल पर योग अच्छा स्वास्थ्य एवं भौतिक दक्षता, मानसिक धरातल पर एकाग्रता मन का संतुलन एवं शांति प्रदान करता है। आध्यात्मिक धरातल पर यह जीवन और मृत्यु के चक्र से मुक्ति तथा शाश्वत आनंद अमरता पूर्णता एवं अनंत शांति प्रदान करता है।

वेदांत शास्त्रों में कहा गया है कि क्रिया योग वेदांत उपनिषदों एवं गीता का प्रायोगिक भाग है। क्रिया योग तीनों योगा का मेल है कर्मयोग ज्ञानयोग भक्तियोग। वेदांत के उपदेशों का सार क्रिया योग अभ्यास के माध्यम से अनुभूत किया जा सकता है। सभी योग एवं साधनों का उद्देश्य साधक को अंतर्मुखी बनाना है एवं क्रिया योग तकनीक इस प्रक्रिया को तीव्र बनाती है। योग साधना की अन्य प्रविधि ओके माध्यम से सुप्त आध्यात्मिक ऊर्जा (कुंडलिनी शक्ति) का जागरण एवं संतुलित योगिक मन की प्राप्ति आसान नहीं होती किंतु क्रिया योग में साधक को मंकी दिव्या अवस्था बनाए रखने हेतु सक्षम करने में यह बहुत कम समय में संभव होता है। लाहिड़ी महाशय द्वारा प्रसारित क्रिया योग प्रविधि अदृश्य ब्रह्मांड ऊर्जा को मूलाधार से मेरुदंड के माध्यम से उठाकर मस्तिष्क तक पहुंचाती है एवं व्यक्ति को दिव्य अनुभूति उपलब्ध कराती है। क्रिया योग के अभ्यास से एक व्यक्ति की जागतिक चेतना सरलता से दिव्य चेतना में परिवर्तित हो जाती है। सभी जागतिक गतिविधियों के साथ विश्व में रहते हुए भी साधक दिव्य चेतना एवं दिव्य प्रकाश की सहायता से सर्वव्यापी दिव्य अस्तित्व की अनुभूति करता है।

क्रिया योग मुक्ति हेतु आवश्यक समय को बहुत कम करता है एवं इसे एक जन्म में संभव बनाता है। जो व्यक्ति जितना अधिक इस प्रविधि का निष्ठा से नियमित एवं ईमानदारीपूर्वक अभ्यास करेगा वह व्यक्ति उतना ही सविकल्प समाधि (परम चेतना की अवस्था) एवं निर्विकल्प समाधि (ब्रह्म चेतना या नाड़ी की स्पंदनहीन  अवस्था) की अनुभूति प्राप्त करेगा।

क्रिया योग प्रविधि के छह स्तर हैं जिनके माध्यम से क्रियावान विभिन्न केंद्रों को नियंत्रित कर सकता है तथा आत्म अनुभूति प्राप्त कर सकता है। इन्हें एक आत्म उपलब्ध योगी से तथा उसके सीधे मार्गदर्शन एवं संरक्षण में सीखना चाहिए। इन छह चरणों की पूर्णता के पश्चात ब्रह्म चेतना स्वता उदय होती है तब आपका जीवन आनंद से परिपूर्ण होगा एवं परम सत्य की प्राप्ति ही हमारा लक्ष्य है| वह जन्म से मुक्ति एवं दिव्य अवस्था की अनुभूति सभी धर्मों का स्वप्न है यह हिंदुओं का "मोक्ष" है बौद्धों का "निर्वाण" एवं ईसाईयों का "स्वर्ग का साम्राज्य" है। ब्रह्म चेतना की अनुभूति जीवन का लक्ष्य है।

 


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