भारत में गरीब होना पाप है!

रिपोर्ट: शशि शेखर

ये पंक्तियां लिखते वक्त मेरे दिलो-दिमाग पर मुजफ्फरपुर और देवरिया की अबोध बालिकाओं की आहें-कराहें दस्तक दे रही हैं। जो लोग तीन दिन बाद आजादी का जश्न मनाने के लिए बेताब बैठे हैं, वे एक पल रुककर सोचते क्यों नहीं कि गुजरे सात दशकों में हमने हिन्दुस्तान के बचपन और तरुणाई को क्या दिया है? हमें यह विचार भी करना चाहिए कि ‘आज के बच्चे कल के नागरिक’ जैसे भावुक नारों का ऐसा दर्दनाक हश्र क्यों हुआ? 

एक हिन्दुस्तानी होने के नाते जब पीछे पलटकर देखता हूं, तो पाता हूं कि देश में तरक्की के नाम पर आधुनिक संयंत्र आए, सड़कें बनीं और सिर के ऊपर से बेशुमार हवाई जहाज उड़ने लगे, मगर आखिरी सीढ़ी पर बैठे लोगों के लिए खुशहाली आज भी किसी मृग-मरीचिका से कम नहीं। उन ‘अज्ञानियों’ को तो यह तक नहीं पता कि उनका देश संसार की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, क्योंकि उनकी जिंदगी सिर्फ तीन लफ्जों के इर्द-गिर्द ही तमाम हो जाती है- रोटी, कपड़ा और मकान। इन तीन शब्दों को सार्थक बनाने के लिए आजाद मुल्क के तमाम हुक्मरानों ने क्या किया?

चुनाव-दर-चुनाव मनभावन नारे उछाले और बाद में सुविधानुसार उन्हें बिसरा दिया। 

किसी और मुद्दे पर हमारे नेता एक हों, न हों, पर इस नीति और नीयत पर हम अखंड एका पाते हैं।

हमारे राजनेता दो मुखौटे रखते हैं। सत्ता आने-जाने के साथ वे उन्हें बदलते रहते हैं। अगर कुछ नहीं बदलता, तो वह है साधारण जन का नसीब। ‘निर्भया’ के साथ र्दंरदगी पर बरपा हंगामे को याद कीजिए। लगता था, पूरा देश महिला सुरक्षा के हक में खड़ा हो गया है। नतीजतन, पहले से कड़े कानूनों को और सख्त बना दिया गया, पर अपराधी संविधान की पोथी बांचने के बाद जुर्म को अंजाम नहीं देते। नतीजा सामने है। मुजफ्फरपुर और देवरिया की परतें उघड़ रही हैं और उनसे फूटती दुर्गंध से देश बजबजा रहा है। उस समय के विपक्षी आज सत्ता में हैं। कल के सत्तानशीं अब विपक्ष में हैं। लिहाजा नारों और आक्रोश पर उनका अधिकार है। वे इसका उपयोग कर रहे हैं, जिसकी वजह से समूचा देश आरोपों की आतिशबाजी में तप रहा है। हो सकता है, यह हंगामा कुछ अफसरों को नाप दे, पर चेहरे बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। वैसे ही, जैसे कानून बदलने या बनाने से बलात्कार नहीं रुकते, बदहाली नहीं थमती।

जरूरत है सोच बदलने की, पर कोई राजनीतिक दल या शख्सियत इसे लेकर गंभीर नहीं दिख रही। वजह? हमारे कई ‘माननीयों’ या उनके परिजनों पर भी नारी उत्पीड़न के तरह-तरह के मामले चल रहे हैं। वे डरते हैं कि कहीं उनके चेहरों पर चस्पां नकाब न उतर जाए। इसीलिए हमारे राजनेता समूचे विमर्श को सफलतापूर्वक भटका देते हैं। मामले की तह तक जाने की बजाय सारी बहस को पार्टी, व्यक्ति और तत्कालीन हुकूमत से जोड़ दिया जाता है। 

इसके बदले अगर हमारे राजनीतिक प्रतिष्ठानों ने एकजुट होकर भय, भूख और गरीबी से संघर्ष किया होता, तो आज ये हालात न होते। मैं यहां विनम्रतापूर्वक दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का उल्लेख करना चाहूंगा। सरकारी आंकड़ों का दावा है कि यहां रहने वालों में 54.67 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिन्हें धनवानों की श्रेणी में गिना जा सकता है। इसी दिल्ली के मंडावली में तीन अबोध बच्चियों की भूख से मौत हुई और एक सप्ताह के भीतर गाजियाबाद में भी ऐसा हौलनाक मामला सामने आया। ऐसा विरोधाभास! अमीरी इतनी संवेदना रहित और गैर-जिम्मेदार कैसे हो सकती है? अगर यहां के लोग लापरवाह हैं, तो गरीबों के वोट से चुने जाने वालों का तंत्र क्या कर रहा था? इस तंत्र ने इन अबोधों को भोजन और जीने का हक दिलाने की कोशिश की बजाय लीपापोती से काम चला लिया। वे ऐसा करते आए हैं, वे ऐसा ही करते रहेंगे, क्योंकि हमारी राजनीतिक व्यवस्था ऐसे मसलों के समूचे हल के लिए प्रतिबद्ध नहीं है। हमारे समझदार नेता जानते हैं कि सारा हंगामा एक-दो दिन का है। बाद में जनता का ध्यान अपने आप भटक जाएगा। इतने बड़े देश के अलग-अलग हिस्सों में तरह-तरह की त्रासदियां आकार लेंगी। ऐसे में, लोगों को भला एक ही मुद्दे पर अटके रहने की फुरसत कहां? 

आम आदमी को अटकाने और भटकाने की इस प्रक्रिया ने हमारे गणतंत्र को कोलाहल तंत्र में बदल दिया है। 

कौटिल्य ने अर्थशास्त्र  में लिखा था- शासक को अपनी प्रजा की रक्षा और बेहतरी के मामले में संवेदनशील होना चाहिए, पर हमारे लोकतंत्र में इसका उल्टा हो रहा है। हमारे कुछ नेता जानवरों की रक्षा और बेहतरी के लिए तो प्रतिबद्धता जताते हैं, पर इंसानों का कितना मोल है उनकी दृष्टि में? मंडावली की घटना की ओर लौटने की इजाजत चाहूंगा। जिस अभागे मंगल सिंह की बच्चियों ने भूख से दम तोड़ा, उसके पास न राशन कार्ड था और न ही सामाजिक सुरक्षा का कोई आधार। वह आधार कार्ड के ऊपर संसद में करोड़ों रुपये की कीमत पर होने वाली बहस से अनजान जब रोजगार की तलाश में घर से निकला, तो नितांत निराधार था। उस परिवार को भूख ने महज इसलिए मिटा दिया, क्योंकि वे उस किसी मजहब, बिरादरी अथवा समूह के सदस्य नहीं थे, जिन्हें ‘वोट बैंक’ माना जाता है। 

हिन्दुस्तान का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि हम परदेसी घुसपैठियों अथवा पशुओं के प्रति अपनी संतानों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील हैं।

यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि जिस तथाकथित वोटबैंक पर शाब्दिक लाड़ बरसाया जाता है, खुद उसकी हालत बहुत खराब है। उनकी झोपड़ियां हर बारिश में टपकती हैं, हर सर्दी में कंपकंपाती और हर गरमी में ताप का शिकार बनती हैं। इसके उलट उनके वोट से राज-प्रासादों में जा बैठे लोग ऐश-ओ-इशरत जी रहे हैं। इनमें से अधिकांश के ऊपर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मुकदमे चल रहे हैं।

सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि क्या भारत में गरीब होना वाकई पाप है? क्या आपको नहीं लगता कि विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का ख्वाब देखने और दिखाने वालों को पहले इनकी चिंता करनी चाहिए? जब तक इन गरीबों को गुरबत से आजादी नहीं मिलती, तब तक हमें जश्न-ए-आजादी मनाने का कोई हक नहीं।


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