उम्मीदों के साल के बाद आर्थिक मोर्चे पर प्रदर्शन करने की चुनौती

रिपोर्ट: साभारः

केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के लिए आर्थिक मोर्चे पर 2015 का साल सबसे अहम साबित होने जा रहा है। इसके लिए घरेलू और वैश्विक दोनों तरफ से नई चुनौतियां सामने आने वाली हैं। एक ओर जहां 2014 उम्मीदों का साल था वहीं आज से शुरू हो रहे साल 2015 में सरकार को प्रदर्शन कर साबित करना होगा कि वह देश के लिए सही सरकार है और अर्थव्यवस्था को मजबूती की ओर ले जाने के साथ ही रोजगार के अधिक अवसर पैदा करने की कूवत उसमें है। इसके लिए सरकार की नीतियों और उनके कार्यान्वयन की परीक्षा होगी। इसके साथ ही 2015 में मोदी सरकार पूरे साल के लिए अपना पहला आम बजट पेश करेगी जो सरकार के आर्थिक लक्ष्यों और उनको हासिल करने के लिए किये जाने वाले फैसलों की पूरी तसवीर व दिशा पेश करेगा। साथ ही सरकार आर्थिक सुधारों पर कैसे आगे बढ़ती है उसकी भी झलक इसमें मिल जाएगी। सरकार की सबसे बड़ी चुनौती एक स्थिर रुपये को लेकर होगी। 2014 में देश में 42.3 अरब डॉलर का एफआईआई इनफ्लो हुआ। जबकि 2013 में यह राशि केवल 12 अरब डॉलर रही थी। दूसरी सबसे बड़ी बात क्रूड की कीमत में आई भारी कमी थी। मोदी सरकार के सत्ता में आने के समय 26 मई, 2014 को क्रूड की कीमत 108 डॉलर प्रति बैरल थी जो इस समय घटकर 54 डॉलर प्रति बैरल से भी कम रह गई है। यह दो कारक थे जिनके चलते रुपया स्थिर रहा। हालांकि पिछले कुछ दिनों में यह दबाव में रहा है। लेकिन 2015 में हालात बदल रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था पांच फीसदी की दर से बढ़ रही है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरो में बढ़ोतरी करेगा। ऐसे में वह निवेश के लिए आकर्षक बनने जा रहा है। साथ ही भारत में ज्यादा निवेश सावरेन फंडों के जरिये आया था और उनकी कमाई कमोडिटी से हो रही थी। लेकिन क्रूड और दूसरी कमोडिटी की कीमतें क्रैश हुई है। वही अधिकांश इमर्जिंग मार्केट की हालत बहुत अच्छी नहीं है। अमेरिका ही वैश्विक अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजिन दिख रहा है। जबकि यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं, जापान और रूस की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही हैं। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबाव ज्यादा रहेंगे और एफआईआई का प्रवाह कमजोर हो सकता है। इस स्थिति में रुपये को कैसे स्थिर रखा जा सकता है यह सरकार के लिए चुनौती होगी। अर्थव्यवस्था की विकास दर को तेज करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है। जहां तक 2014-15 की बात है तो जीडीपी की विकास दर पांच फीसदी के आसपास ही रहेगी। लेकिन निवेश को आकर्षित करने में सरकार अभी तक कामयाब नहीं हुई है। जहां तक निजी निवेश की बात है करीब एक तिहाई कंपनियों की कमाई उनके डेट सर्विसिंग के लिए जरूरी संसाधनों से भी कम रही है। इसलिए सारा दारोमदार सार्वजनिक निवेश पर ही रहेगा। पहले से ही कमजोर राजस्व वृद्धि को झेल रही सरकार कैसे संसाधन जुटाती है यह विकास दर की दिशा तय करेगा। जहां तक महंगाई की बात है तो इस मोर्चे पर सरकार की राह आसान रहेगी। घरेलू कृषि उत्पादन गिरने के बावजूद महंगाई नियंत्रण रहने के आसार हैं। वहीं सरकार को लोगों और कारपोरेट जगत की उम्मीदों पर भी खरा उतरना होगा। हालांकि सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर गतिविधियों को तेज करने के लिए साल के अंतिम दिनों में भू अधिग्रहण, बीमा अधिनियम, कोयला खनन सहित तमाम कानूनों में संशोधन के लिए अध्यादेश जारी किये हैं ताकि निवेशकों को भरोसा दिलाया सके कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से सक्रिय है। लेकिन इनमें से भू अधिग्रहण और बीमा अधिनियम में संशोधनों को संसद में पारित कराना सरकार के लिए थोड़ा मुश्किल काम हो सकता और यूपीए सरकार के समय न्यूक्लीयर डील पर व एनडीए के पिछले कार्यकाल में पोटा पर संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र बुलाने की कवायद दोहरानी पड़ सकती है। वहीं श्रम सुधारों और विनिवेश जैसे सुधारों पर सरकार को कुछ राज्यों व भाजपा के सहयोगी संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही अगला साल भी कई राज्यों में चुनावों का साल होगा। इसलिए कड़े आर्थिक फैसलों के साथ सरकार को कहीं न कहीं मध्य वर्ग को खुश करने के फैसले भी लेने होंगे और सब्सिडी कटौती जैसे कड़े फैसलों को टालना पड़ सकता है। इसका असर पहले से खस्ता हाल राजकोषीय संतुलन पर पड़ सकता है।


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