शनिदेव को लोहा चढ़ाने से मिलता है सोना, जानें कैसे

रिपोर्ट: साभार

शनिदेव को लोहा अत्यधिक प्रिय है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी पृथवी के गर्भ में सर्वाधिक रूप से लोहा ही समाया हुआ है। लोहा ही हैं जो तपकर फौलाद बनता है। वास्तविकता में शनि और मंगल के बीच लोहा ही वो कनेक्शन है जिसे यह दो ग्रह एक दुसरे से जुड़े हुए हैं। शनिदेव को मंगल की वस्तुएं चढ़ाने से बल मिलता है। कुछ विशेष अवसरों पर लोहा चढ़ाने से कलियुग के क्रोधित देवता का मन पिघल जाता है। इस विशेष योग में ज़रा सा लोहा बन जाता है पारस पत्थर। इस विशेष योग में शनिदेव पर विधि-विधान से लोहा चढ़ाने पर होती है अभीष्ट फल की प्राप्ति। पौराणिक मतानुसार व किवंदती के अनुसार सूर्यपुत्र शनिदेव को देवगुरु वृहस्पति से यह वरदान प्राप्त है की जब कभी भी शनिवार के दिन वृहस्पति का नक्षत्र विशाखा में आता है उस दिन शनिदेव पर लोहा चढ़ाने से व्यक्ति को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। मान्यतानुसार श्रावण मास में शनिवार के दिन गुरु का नक्षत्र विशाखा आने पर अगर सप्तमी तिथि पड़ती है तो सुयश नाम का योग बनता है। इस योग को लोह दिवस के नाम से भी जाना जाता है। मान्यतानुसार कलियुग में शनिदेव का वास लोहे में होता है। ऐसे में शनिदेव को चढ़ाया जाने वाला लोहा सुवर्ण के रूप में पुनः प्राप्त होता है। ऐसा ही एक दान पौराणिक काल में श्रीराम के पिता राजा दशरत ने भी किया था। राजा दशरथ द्वारा निर्मित शनिदेव स्वयं राजा दशरथ से यह बात इस श्लोक के रूप में कहते हैं। श्लोक: (शनिरुवाच) शमीपत्रैः समभ्यर्च्य प्रतिमां लोहजां मम । माषौदनं तिलैर्मिश्रं दद्याल्लोहं तु दक्षिणाम् ॥४९॥ लोह दिवस के रूप में ऐसा ही सुंदर योग आगामी श्रावण मास के शनिवार दिनांक 22.08.15 को पड़ रहा है। दिनांक 22.08.15 को शनिवार का दिन है, वृहस्पति के नक्षत्र विशाखा है तथा सप्तमी तिथि भी है।


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