आखिर मोदी ने पनगढ़िया को ही क्यों चुना?

रिपोर्ट: साभारः

योजना आयोग को खत्म करके बनाए गए नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉरमिंग इंडिया यानी नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद पर अरविंद पनगढ़िया की नियुक्ति अनायास नहीं है। अंतरराष्ट्रीय और मुक्त व्यापार के पैरोकार अर्थशास्त्री जगदीश भगवती के शागिर्द अरविंद पनगढ़िया खुद भी दिग्गज अर्थशास्त्री हैं। भारतीय मूल के इस 62 वर्षीय अमेरिकी अर्थशास्त्री ने पिछले साल मोदी के गुजरात मॉडल का खुल कर पक्ष लिया था और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की स्थापनाओं को एक तरह से चुनौती दे डाली थी। दरअसल बहस एक बिजनेस अखबार में मोदी के विकास मॉडल पर पनगढ़िया और उनके गुरु जगदीश भगवती के लिखे लेख से शुरू हुई थी। बहस का लब्बो-लुआब यही था कि भारत जैसे देश में बाजार अर्थव्यवस्था को ज्यादा तवज्जो दिया जाना चाहिए ताकि सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चीजों पर निवेश करने के लिए संसाधन पैदा किए जा सके। जबकि अमर्त्य सेन के विकास के केरल मॉडल का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मामलों पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत है। शिक्षा और स्वास्थ्य की तरक्की के बगैर हासिल किया गया आर्थिक विकास खोखला है। देश के अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं के बीच इस बहस के गर्माने के साथ ही यह कयास लगाया जाने लगा था कि केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद भगवती या पनगढ़िया में किसी एक को सरकार के सर्वोच्च आर्थिक थिंक टैंक का अगुवा बनाया जा सकता है। बहरहाल, अरविंद पनगढ़िया के नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद पर बहाली ने इस कयास पर मुहर लगा दी है। बिबेक देबराय और वीके सारस्वत नीति आयोग के पूर्णकालिक सदस्य होंगे।


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