नेताजी के जन्मदिवस पर विशेष : राष्ट्रीय स्वतंत्रता को समाजवाद से जोड़नेवाला नायक

रिपोर्ट: नवनीत कुमार

20वीं सदी के मध्य और अंत में कई छात्र एवं युवा संगठनों का जन्म हुआ. ये साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन को पूर्ण स्वराज की मांग द्वारा एक समग्र रूप देना चाहते थे और राष्ट्रवाद को समाजवाद के साथ मिलाने पर जोर दे रहे थे. 1920-30 के दशक में भारतीय राजनीति में प्रभावशाली वामपंथी समूहों का उदय हुआ. भारतीय युवाओं के बीच समाजवाद एक सिद्धांत बन गया. ऐसे वक्त में सुभाष चंद्र बोस युवाओं के एक नायक के तौर पर उभरे. वह अपने दृढ़ संकल्प, अजेय साहस, अपूर्व त्याग और अद्भुत शौर्य के साथ मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए बिना किसी साधन और सहायता के एक आदर्श स्थापित कर चुके थे. भारतीय सिविल सेवा (आइसीएस) की परीक्षा पास करने के बाद विवेकानंद व अरविंद घोष की आध्यात्मिक और चितरंजन दास की राजनीतिक विचारधारा पर चलने के लिए उन्होंने इस सरकारी पद को छोड़ दिया था. संपूर्ण यूरोप महाद्वीप की यात्रा ने सुभाष के अंदर भारत को परखने का अंतरराष्ट्रीय नजरिया विकसित किया. उन्होंने साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद की भर्त्सना और समाजवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए पूरे देश का दौरा किया. भारत में संपूर्ण स्वराज की स्थापना के लिए 1928 में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के साथ ‘इंडिपेंडेंस फॉर इंडिया लीग’ की स्थापना की. गांधी जी के हस्तक्षेप के बाद सुभाष ने 1928 में महाराष्ट्र प्रांतीय कांफ्रेंस में मजदूरों और अंतरराष्ट्रीयवाद के बीच गंठजोड़ का आह्वान किया. भारतीय राष्ट्रवादियों को राजनीतिक डेमोक्रेट और सोशल कंजरवेटिव का मिश्रण न बनने के लिए आगाह किया. सुभाष ने कहा कि अगर हम वाकई भारत को महान बनाना चाहते हैं, तो हमें लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद पर लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहिए. कांग्रेस पार्टी के भीतर 1936 व 1937 में पंडित नेहरू और 1938 व 1939 में सुभाष चंद्र बोस के अध्यक्ष चुने जाने में वामपंथी रुझान स्पष्ट रूप में दिखा. यह कांग्रेस के भीतर सोशलिस्ट पार्टी के निर्माण में भी दिखा. 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष को निर्विरोध कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था. इससे कांग्रेस में सुधारवादी नीतियों की मजबूती को बल मिला. इसी दौरान पश्चिमी देशों में युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. हरिपुरा कांग्रेस में सम्राज्यवादी युद्ध के विरोध में प्रस्ताव को एक स्वर से अपना कर भारत को इस जंग से दूर रखने का निश्चय किया गया. सुभाष ने कांग्रेस से हालात का लाभ उठाने की अपील की. 1939 में त्रिपुरा में उन्हें दोबारा कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया. त्रिपुरा कांग्रेस के अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार को पूर्ण स्वराज का अल्टीमेटम देने का अध्यक्ष चुना गया. हालांकि गांधी जी तथा दक्षिणपंथी सोच वाले अन्य सदस्यों के साथ बढ़ते मतभेद के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. सुभाष ने अप्रैल 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की. फॉरवर्ड ब्लॉक एक सुधारवादी और प्रगतिशील संगठन था, जिसका मकसद एक झंडे के नीचे वामपंथी ताकतों को गोलबंद करना रहा. बाद में कांग्रेस कार्यसमिति ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई की, तब सुभाष ने बड़ी सटीक टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अधिक प्रभावशाली क्रियाओं की ओर ले जानेवाली एकता और निष्क्रिय एकता के बीच अंतर करना चाहिए. जब वर्ष 1942 में पूरा देश उबाल पर था. सुभाष ने विदेश से स्वतंत्रता संघर्ष को लगातार जारी रखा. आजाद हिंद फौज की बागडोर अपने हाथ में लेना और विश्व के नौ प्रमुख देशों द्वारा उसे मान्यता मिलना उनकी सांगठनिक क्षमता को प्रदर्शित करता है. सुभाष के ‘दिल्ली चलो’, ‘तुम मुङो खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ और ‘जय हिंद’ के राष्ट्रीय नारों से दक्षिण-पूर्व एशिया में लगभग 20 लाख की संख्या वाली आजाद हिंद फौज जोश और भावनाओं से भर गयी. आजाद हिंद फौज की मुहिम में महिलाओं की भी व्यापक भागीदारी रही, जो रानी झांसी रेजीमेंट के तहत काम करती थी. सुभाष को राजनीतिक संघर्ष और विचारों के फलक से देखें, तो वह मौलिक शास्त्रीय राजनीतिक विचारक नहीं थे. फिर भी आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान पाने के अधिकारी रहे. उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता, समाजवाद और साम्यवाद के समन्वयवादी विचारों को लोकप्रिय बनाया. उनके विचार 21वीं सदी के राष्ट्र के भविष्य के लिए जीवंत और सिद्धांत के रूप में व्यावहारिक और प्रासंगिक है. (लेखक विनोबा भावे विश्वविद्यालय में सुभाष चंद्र बोस पर शोध कर रहे हैं.)


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