राष्ट्रपति बराक ओबामा की यात्रा को लेकर अमेरिका और भारत में उत्साह का माहौल है. पिछले कुछ वर्षो में भारत-अमेरिका संबंधों में बेहतरी के बावजूद द्विपक्षीय संबंधों की संभावनाओं को संतोषजनक रूप से हकीकत नहीं बनाया जा सका है. ओबामा और मनमोहन सिंह की कोशिशों के बाद भी वैश्विक राजनीति में दोनों देश कई मसलों पर साङोदारी बना पाने में सफल नहीं हो पाये थे. मोदी सरकार से अमेरिका को उम्मीदें हैं, तो मोदी भी राजनीतिक और कूटनीतिक पटल पर बिना किसी पूर्ववर्ती बोझ के नये सिरे से द्विपक्षीय संबंधों की इबारत लिखने की स्थिति में हैं. कुछ महीने पहले अमेरिका में ओबामा और मोदी की मुलाकात के दौरान दोनों

20वीं सदी के मध्य और अंत में कई छात्र एवं युवा संगठनों का जन्म हुआ. ये साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन को पूर्ण स्वराज की मांग द्वारा एक समग्र रूप देना चाहते थे और राष्ट्रवाद को समाजवाद के साथ मिलाने पर जोर दे रहे थे. 1920-30 के दशक में भारतीय राजनीति में प्रभावशाली वामपंथी समूहों का उदय हुआ. भारतीय युवाओं के बीच समाजवाद एक सिद्धांत बन गया. ऐसे वक्त में सुभाष चंद्र बोस युवाओं के एक नायक के तौर पर उभरे. वह अपने दृढ़ संकल्प, अजेय साहस, अपूर्व त्याग और अद्भुत शौर्य के साथ मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए बिना किसी साधन और सहायता के एक आदर्श स्थापित कर चुके थे. भारतीय सिविल

मोदी के व्यापक और बड़े व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द रहस्यों का घेरा है. किसी को भी मालूम नहीं है कि वास्तविक मोदी कौन हैं. क्या उनके चारों ओर बहुत सोच-समझ कर तैयार किया गया विस्तृत प्रचार तंत्र वास्तविक नरेंद्र मोदी से बिल्कुल भिन्न आवरण खड़ा करने में कामयाब हो गया है? क्या वास्तविक नरेंद्र मोदी हमारे सामने उपस्थित होंगे? संसदीय चुनावों के बाद भी लगातार प्रचार, प्रदर्शन और खुद को आगे दिखाने की प्रवृत्ति के निर्बाध जारी रहने की स्थिति में वास्तविकता अब तक छुपी हुई है और मिथक बनते जा रहे हैं. प्रचार तथ्यों को धुंधला कर देता है, प्रदर्शन मिथकों को पुष्ट करता है, और खुद को आगे दिखाने

चुपचाप काम में जुटे हैं चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद तेलंगाना अलग राज्य बना. तेलंगाना को हैदराबाद के रूप में बनी बनायी राजधानी मिल गयी. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू बजाय इस पर हंगामा करने के नयी राजधानी के निर्माण के काम में लग गये. गौरतलब है कि चंडीगढ़ के लिए हरियाणा और पंजाब के बीच आज तक तकरार है. राज्य बंटवारे के बाद आंध्र प्रदेश को जो भी संसाधन और क्षेत्र मिला, उसी का उपयोग करके राज्य को विकसित करने के लिए मुख्यमंत्री नायडू निरंतर कोशिश में लगे हैं. दूसरी ओर बिहार से अलग होने के बाद से झारखंड के नेता संसाधनों का रोना ही रोते

विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी जो कर रहे हैं, वह दूरंदेश नजरिये से संचालित क्रिया-कलाप है. अमेरिका यात्रा के पहले वह इतनी रफ्तार पकड़ लेना चाहते हैं कि कोई राजनयिक गतिरोध उनकी उपलब्धियों को धूमिल न कर सके. संसार भर के कुल यूरेनियम भंडार का तीसरा हिस्सा ऑस्ट्रेलिया में है. यह देश हर साल 7,000 टन यूरेनियम का निर्यात करता है. लेकिन, 2012 में भारत को किये जानेवाले निर्यात पर रोक लगा दी गयी थी, क्योंकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था. अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर करार के बाद भी ऑस्ट्रेलिया अपना फैसला बदलने को तैयार नहीं हुआ

केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के लिए आर्थिक मोर्चे पर 2015 का साल सबसे अहम साबित होने जा रहा है। इसके लिए घरेलू और वैश्विक दोनों तरफ से नई चुनौतियां सामने आने वाली हैं। एक ओर जहां 2014 उम्मीदों का साल था वहीं आज से शुरू हो रहे साल 2015 में सरकार को प्रदर्शन कर साबित करना होगा कि वह देश के लिए सही सरकार है और अर्थव्यवस्था को मजबूती की ओर ले जाने के साथ ही रोजगार के अधिक अवसर पैदा करने की कूवत उसमें है। इसके लिए सरकार की नीतियों और उनके कार्यान्वयन की परीक्षा होगी। इसके साथ ही 2015 में मोदी सरकार

इस नये साल के मौके पर इस सवाल पर विचार करें कि ‘मैं अपना जीवन कैसे बदल सकता हूं?’ जीवन में रूपांतरण लाने और हर तरह के हालात में आगे बढ़ते रहने के लिए आंतरिक खुशहाली की एक शक्तिशाली प्रक्रिया बता रहे हैं सद्गुरु जग्गी वासुदेव.. हर इनसान, जीवन की प्रक्रिया के द्वारा जाने-अनजाने अपनी एक खास छवि, एक खास शख्सीयत बनाता है. इस छवि का, जिसे आपने अपने अंदर गढ़ा है, असलियत से कोई लेना-देना नहीं है. इसका आपके अस्तित्व, आपकी आंतरिक प्रकृति से कोई संबंध नहीं है. यह एक खास छवि है, जो आपने खुद, बहुत हद तक अनजाने में ही, बनायी है. बहुत कम इनसानों ने अपनी छवि

इस साल भारत ने दूसरे देशों के साथ रिश्तों की नयी इबारत लिखने की ओर सधे हुए कदम बढ़ाये. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी नौ विदेश यात्राओं के क्रम में एक तरफ बड़े देशों से संबंध सुधारा, तो छोटे देशों से दोस्ती पर भी उतना ही ध्यान दिया. किसी भारतीय प्रधानमंत्री का 33 साल बाद फिजी पहुंचना चर्चा का विषय रहा. भारतीय प्रधानमंत्रियों की विदेश यात्रएं आरंभ से ही-नेहरू के कार्यकाल से ही-चर्चा का विषय बनती रही हैं. इसलिए यह दावा बहुत संगत नहीं लगता कि वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी की असाधारण राजनयिक सक्रियता ने कोई अभूतपूर्व उपलब्धि दर्ज करायी है, परंतु यह सवाल उठाना जायज है कि

भारत में गरीबों की संख्या सबसे ज्यादा है। दुनिया के एक-तिहाई निर्धनतम लोग यहां रहते हैं। उचित उपचार व पालन-पोषण के अभाव में हर साल पांच वर्ष से कम आयु के सबसे ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है। 60 फीसदी से ज्यादा लोग खुले आसमान के नीचे दैनिक क्रियाएं संपन्न करते हैं। हमारे यहां टॉयलेट नहीं हैं और न मकान हैं। दुनिया के सर्वाधिक बेघर हमारे यहां हैं। झुग्गी में रहने वालों की संख्या ब्रिटेन की आबादी के तीन गुने से ज्यादा है। डॉलर वाले अरबपतियों की संख्यामें हम दुनिया में छठे स्थान पर हैं। शीर्ष 100 भारतीय अरबपतियों के पास 175 अरब डॉलर की सामूहिक संपत्ति है। हॉन्गकांग, स्विट्जरलैंड,

नई दिल्ली, एक महामना..! दूसरा उदारमना..! एक दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष। दूसरे भाजपा के अध्यक्ष रहे। दोनों ही भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष। दल भले ही विरोधी रहे हों। दोनों समकालीन भी नहीं। फिर भी दोनों व्यक्तित्वों में कई समानताएं। एक ने शिक्षा और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में प्रतिमान स्थापित किए। दूसरे ने विकास और विदेश नीति के क्षेत्र में झंडे गाड़े। सबसे बड़ी दो समानताएं कि दोनों ही हिंदी के पुरोधा और सभी वादों से ऊपर उठकर अजातशत्रु!! स्वाधीनता सेनानी पंडित मदन मोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी। दोनों को जन्मदिन से पूर्व सम्मान दोनों विभूतियों को उनके जन्मदिन से ठीक एक दिन पहले सर्वोच्च नागरिक सम्मान

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का सम्मान संसद का सम्मान है। आजादी के बाद से अब तक उन जैसा सुसंस्कृत और सभ्य सांसद नहीं हुआ। विवादों से तो उनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा। ऐसी शख्सियत को भारत रत्न देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बेहतर काम किया है, जिसे पूरा देश याद रखेगा। वैसे भी अटल का नाम काल के कपाल पर लिखा है। देश आजाद होने के बाद जब से संसद गठित हुई तब से लेकर आज तक वाजपेयी जैसा कोई निर्विवाद सांसद नहीं हुआ। उनकी विद्वता का सभी लोहा मानते हैं। उन्होंने संसद की गरिमा का भरपूर ख्याल रखा। किसी को याद नहीं होगा


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